"मेरी बहुत बड़ी ख़्वाहिश है कि मैं दोबारा आपसे बात कर सकूं और आपको देख सकूं, लेकिन मैं नहीं जानता क्या करूं. जो व्यक्ति आपसे दोस्ती कर चुका हो उस के लिए मुमकिन नहीं कि वह आपके बग़ैर जी सके. जो कुछ मैंने लिखा है कृपया करके उसके लिए मुझे माफ कर दें."
जर्मन भाषा में लिखी गई अल्लामा इक़बाल की कई चिट्ठियों में से ये एक ख़त में बयां किए उनके जज्बात हैं.
इमा से इक़बाल की मुलाक़ात नीकर नदी के किनारे मौजूद हरे-भरे मनमोहक दृश्य वाले हाइडलबर्ग शहर में हुई थी.
एक तो मौसम ही कुछ ऐसा था और ऊपर से इक़बाल की जवानी और फिर सौम्य और सुंदर इमा. इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि एक हिंदुस्तानी शायर का दिल उनके ऊपर आ गया, न आता तो आश्चर्य होता.
इक़बाल की नज़्म, 'एक शाम' (हाइडलबर्ग में नीकर नदी के किनारे पर) से उनके अहसासों का पता मिलता है.
इक़बाल के दिल में इमा की क्या जगह थी और इनका इमा से कैसा रिश्ता था, इसका कुछ अंदाजा इस ख़त से लगाया जा सकता है.
"कृपया करके अपने इस दोस्त को मत भूलिये, जो हमेशा आपको अपने दिल में रखता है और जो आप को भूल नहीं सकता. हाइडलबर्ग में मेरा ठहरना एक सुंदर सपना सा लगता है और मैं इस सपने को दोहराना चाहता हूं. क्या ये मुमकिन है? आप अच्छी तरह जानती हैं."
इन ख़तों से इक़बाल की छवि उन पारंपरिक अवधारणाओं बिलकुल अलग हमारे सामने आती है जो हम शुरू से ही अपने पाठ्य-पुस्तकों और इक़बाल की जयंती या पुण्यतिथि पर दिए जाने वाले भाषणों में देखते रहे हैं.
इन चिट्ठियों में अल्लामा इक़बाल 'हकीमुल उम्मत' (राष्ट्र का उद्धारक) और 'मुफ़क्किर-ए-पाकिस्तान' (पाकिस्तान का चिंतक) कम और इश्क़ के एहसास से लबरेज़ नौजवान अधिक नजर आते हैं.
21 जनवरी 1908 को इक़बाल ने लंदन से इमा के नाम एक ख़त में लिखा,
"मैं ये समझा कि आप मेरे साथ आगे और ख़तो किताबत (पत्र व्यवहार) नहीं करना चाहतीं और इस बात से मुझे बड़ा अफसोस हुआ. अब फिर आपकी चिट्ठी मिली है जिससे बहुत ख़ुशी मिली है. मैं हमेशा आपके बारे में सोचता रहता हूं और मेरा दिल हमेशा ख़ूबसूरत ख्यालों से भरा रहता है. एक चिंगारी से शोला उठता है. और एक शोले से एक बड़ा अलाव रोशन हो जाता है. आप में दया-भाव, करुणा नहीं है, आप नासमझ हैं. आप जो जी में आए कीजिए, मैं कुछ न कहूंगा, सदा धैर्यवान और कृतज्ञ रहूंगा."
इक़बाल उस समय न केवल शादीशुदा थे बल्कि दो बच्चों के बाप भी बन चुके थे.
ये अलग बात है कि कमसिन उम्र में मां-बाप की पसंद से करीम बीबी से होने वाली इस शादी से वे बेहद नाखुश थे.
एक खत में उन्होंने लिखा, "मैंने अपने वालिद साहब को लिख दिया है कि इन्हें मेरी शादी तय करने का कोई हक़ नहीं था, खासकर जबकि मैंने पहले ही इस तरह के किसी बंधन में पड़ने से इनकार कर दिया था. मैं उसे खर्च देने को तैयार हूं लेकिन लेकिन उसको साथ रखकर अपनी जिंदगी बर्बाद करने के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं हूं. एक इंसान की तरह मुझे भी ख़ुश रहने का हक़ हासिल है. अगर समाज या कुदरत मुझे ये हक़ देने से इनकार करते हैं तो मैं दोनों का बाग़ी हूं. अब केवल एक ही उपाय है कि मैं हमेशा के लिए इस अभागे देश से चला जाऊँ या फिर शराब में पनाह लूं जिससे ख़ुदकुशी आसान हो जाती है."
ब्रिटेन पहुंच कर, पूरब के रहस्यपूर्ण और जादुई समाज में पले-बढ़े, अत्यधिक मेधावी इक़बाल ने महिलाओं का ध्यान चुंबक की तरह अपनी ओर खींच लिया.
इस समय तक इनकी कविताएं उत्तर भारत में हर जगह मशहूर हो चुकी थीं और लोग गलियों में इसे गाते फिरते थे, और इस ख्याति का कुछ-कुछ चर्चा इंग्लिस्तान भी पहुंच चुका था.
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